Wednesday, May 15, 2019

What is Tsunamis || सुनामी क्या है?

What is Tsunamis || सुनामी क्या है?-


     भूकंप और ज्वालामुखी के महासागरीय धरातल में अचानक हलचल पैदा होती है और महासागरीय जल का अचानक विस्थापन होता है। परिणाम स्वरूप ऊर्ध्वाधर ऊंची तरंगें पैदा होती हैं। जिन्हें सुनामी या बंदरगाह लहरें या भूकंपीय समुद्री लहरें कहा जाता है। सामान्य तय है शुरू में सिर्फ एक ऊर्ध्वाधर तरंग ही पैदा होती है परंतु कालांतर में जलकर अंगों की एक श्रंखला बन जाती है, क्योंकि प्रारंभिक तरंग की ऊंची शिखर और नीतिगत के बीच जल अपना स्तर बनाए रखने की कोशिश करता है।



          महासागर में जल तरंग की गति जल की गहराई पर निर्भर करती है इसकी गति पुतले समुद्र में ज्यादा और गहरे समुद्र में कम होती है। परिणाम स्वरूप  महासागरों के अंदरूनी भाग इससे कम प्रभावित होते हैं ।तटीय क्षेत्रों में यह तरंगे ज्यादा प्रभावी होती हैं और बड़ा नुकसान पहुंचाती हैं। इसलिए समुद्र में जलपोत पर सुनामी का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। समुद्र के आंतरिक गहरे भाग में तो सुनामी महसूस भी नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि गहरे समुद्र में सुनामी की लहरों की लंबाई अधिक होती है और ऊंचाई कम होती है। इसलिए समुद्र के इस भाग में सुनामी जलपोत को या तो 1- 2 मीटर तथ्यों पर उठा पाती है। इसके विपरीत जब सुनामी पुतले समुद्र में प्रवेश करती है इसकी तरंग लंबाई कम होती चली जाती है, समय वही रहता है और तरंग की ऊंचाई बढ़ती जाती है। कई बार तो इसकी ऊंचाई 15 मीटर या इससे अधिक भी हो सकती है जिससे तटीय क्षेत्र में भीषण विनाश होता है। इसलिए इन्हें उथले जल की तरंगे भी कहा जाता है। 



        सुनामी आमतौर पर प्रशांत महासागर के तट पर जिसमें अलास्का, जापान, फिलीपींस, दक्षिण पूर्व एशिया के दूसरे द्वीप इंडोनेशिया और मलेशिया तथा हिंद महासागर में म्यांमार श्रीलंका और भारत के तटीय भागों में आती है। 

       तट पर पहुंचने पर सुनामी तरंगे बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त करती हैं और समुद्र का जल तेजी से तटीय क्षेत्रों में घुस जाता है और बंदरगाह, शहरों, कस्बों, अनेक प्रकार के ढांचे, इमारतों और बस्तियों को तबाह करता है। क्योंकि विश्व भर में तटीय क्षेत्रों में जनसंख्या सघन होती है और यह क्षेत्र बहुत सी मानव गतिविधियों के केंद्र होते हैं अतः यहां दूसरी प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में सुनामी अधिक जानमाल का नुकसान पहुंचाती है।

         दूसरी प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में सुनामी के प्रभाव को कम करना कठिन है क्योंकि इससे होने वाले नुकसान का पैमाना बहुत बड़ा है। 

         किसी अकेले देश या सरकार के लिए सुनामी जैसी आपदा से निपटना संभव नहीं है। 26 दिसंबर 2004 को सुनामी आने के बाद भारत ने इसके खतरे को कम करने के उपाय पर काम शुरू किया सुनामी की चेतावनी जारी करने का इंडियन ओसियन सुनामी वार्निंग मिसीकेशन सिस्टम (IOTWS) विकसित हुआ। भारत-ऑस्ट्रेलिया , इंडोनेशिया समेत 18 देश इस बात पर सहमत हुए कि वे आपस में सुनामी जैसी किसी भी आपदा की भविष्यवाणी संबंधी सूचना एक दूसरे के साथ साझा करेंगे।



          IOTWS मुख्यतः दो प्रकार से काम करता है पहला समुद्र में बन रहे दबाव को रिकॉर्ड करता है । दूसरा लहरों को मापता है तथा उसके आधार पर सुनामी का कितना खतरा है इसका आकलन किया जाता है। 

          भूकंप या सुनामी जैसी किसी आपदा के लिए फिलहाल विश्व में जो भी चेतावनी तंत्र काम कर रहे हैं उनमें 8 घंटे पहले तक किसी आपदा को लेकर चेतावनी दी जा सकती है। वैज्ञानिक विश्व के 14 देशों में कॉस्मिक किरणें डिटेक्टर्स स्थापित करने की दिशा में सक्रिय हैं। यदि सभी 14 जगह कॉस्मिक किरणें डिटेक्टर्स स्थापित कर दिए जाएं तो ऐसी किसी आपदा के संबंध में 20 से 24 घंटे पहले चेतावनी दी जा सकती है। नासा और आर्मोनिम की प्रयोगशालाओं के सहयोग से यह डिटेक्टर्स अब तक बुलगारीआ, क्रोएशिया और भारत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में स्थापित किए जा चुके हैं। एक अध्ययन से पता चलता है कि भूकंप आने से पहले कॉस्मिक किरणों की तीव्रता कम हो जाती है यदि कॉस्मिक किरणों की तीव्रता में कमी का जल्दी पता चल जाता है तो उस सूचना को आगे विकसित कर किसी आपदा के संबंध में सूचना दी जा सकती है । 

         इस प्रकार भूकंप और सुनामी जैसी विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं से कुछ हद तक बचाव किया जा सकता है। 








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