Monday, May 13, 2019

National Green Tribunal (NGT) || राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण

National Green Tribunal (NGT) ||  राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण - 

National Green Tribunal (NGT) ||  राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण

                               National Green Tribunal (NGT) ||  राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण



राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के वर्तमान में अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल है। 
           

                    पर्यावरण संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए अलग से एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (National Green Tribunal (NGT) ||  राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण) अक्टूबर 2010 में अस्तित्व में आया है । इसके गठन की अधिसूचना 18 अक्टूबर 2010 को जारी की गई थी । सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति लोकेश्वर सिंह पांतां को न्यायाधिकरण का प्रमुख बनाया गया था। इस न्यायाधिकरण का गठन राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010 के तहत किया गया है।  इसके लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण विधेयक संसद के दोनों सदनों में मई 2010 में पारित किया गया था । तथा राष्ट्रपति ने इसका अनुमोदन 2 जून 2010 को किया था ।

        नवगठित न्यायाधिकरण को उच्च न्यायालय का दर्जा दिया गया है।  तथा इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थापित किया गया है, तथा इसकी चार अन्य पीठें विभिन्न शहरों में स्थापित  की गई है। 

        राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में कुल 20 सदस्य हैं, जिसमें 10 सदस्य न्यायिक क्षेत्र से तथा शेष 10 सदस्य पर्यावरणीय मामलों में विशेषज्ञता रखने वाले होंगे।  सभी न्यायिक सदस्य हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं। तथा न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के रूप में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश या हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश नियुक्त किए जाते हैं।  इस न्यायाधिकरण के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है तथा वे द्वारा इस पद पर नहीं चुने जा सकते हैं।  पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करने वालों पर न्यायाधिकरण को 3 वर्ष तक के कारावास व ₹100000000 (कॉरपोरेट मामले में ₹250000000 तक) की सजा का अधिकार इस न्यायाधिकरण को है । राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के अस्तित्व में आने से पूर्व में कार्यरत नेशनल एनवायरमेंट अपीलेट अथॉरिटी को अब समाप्त कर दिया गया है।  तथा इसके अधीन विचाराधीन मामले स्वतः ही हरित न्यायाधिकरण में स्थानांतरित हो जाएंगे । उच्च न्यायालय में लंबित पर्यावरण संबंधी मामले में स्थानांतरित हो जाएंगे । 

                ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद भारत विश्व में तीसरा देश है, जहां पर्यावरण संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए अलग से न्यायालय की स्थापना की गई है।  न्यायाधिकरण के फैसलों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय  में अपील की जा सकती है।
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